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दर्द -दबाव- दोराहे -से आगे बिहारी

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कुछ माह पूर्व से बिहार की जनता अपने जेहन में कई सवाल उभरने से गंभीर चिंतन की अवस्था में रही है . कारन बिहार के राजनैतिक परिदृश्य से उत्पन्न दबाव , दर्द और असमंजस भरी राह के हेतुक ही ज्यादा प्रतीत है . इस दरम्यान असहज बिहार ने स्वयं मौन धारण कर लिया . प्र्तेक बिहारी अपनी जगह से मननशील हो पड़ा . ऐसा उस राजनितिक के निकटस्थ तक महसूस किये जो खुद बिंदु या केंद्र बिंदु होने की चेष्टा किये .वैसे अच्छे – अच्छे विश्लेषक कुछ कह पाने में दबाव भी समझे . वहीँ बयान – बल के भ्रम में अन्य भ्रम की तरह स्पष्टीकरण से प्रकटीकरण का राह बढ़ चले . नतीजा वाह वाही के जगह सरलीकरण हो गया जनता के मन में उमड़ते – मघुमड़ते सवालों के कृत्रिम बादलों का . बिहार ने समझा की इन बादलों की गड़गड़ाहट जल से जीवन देने के बजाये कृत्रिम / उधार / गिरवी शैली के भ्रम से क्रम बनाने में लगें है . हिंदुस्तानी नेतृत्व आदरणीय नरेन्द्र मोदी की गया में ताजा परिवर्तन रैली में बादलों की तरह जनसैलाब का उमड़ पड़ना बहुत से विश्लेषण को साफ़ – साफ़ व्यक्त करने की जद्दीजहद से कहीं आगे जा कर जाहिर कर दिया . युवाओं की जोश से भरी भारी संख्या बिहार के जनसमुदाय की भावना की दिशा स्पष्ट कर दी है . लगता बिहार ने अपने विवेक , अनुभव व् ज्ञान से मान लिया है की हिंदुस्तान की लगातार बढ़ते शानदार वैश्विक सम्मान की तरह बिहार का सम्मान राष्ट्रिय – अंतराष्ट्रीय रूप पाने के लिए उसकी उम्मीद किससे जुड़ती है . जनता बता दी की वह पीछे लवटणा नहीं चाहती . उसे अब आगे बढ़ना है . उत्साह से लबरेज आमोख़ास ने अहसास कराया की अजगर व् विषैलों के पेट भरने के लिए उनकी अनिक्क्षा ही है . भाई – भतीजावाद के नाम जीने वाले , जनता को पुलिश से पिटवाने वाले , स्वं को महाज्ञानी व् काबिल मान अहंकार से चलने वाले तथा अवसरवाद की रंगीन से भर्मित करनेवालों को महादरकिनार करने का मन बना ली है . ———– अमित शाश्वत

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