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प्रत्यूषा , प्रश्न , प्रज्ञा और प्रमाण पथ

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हिंदुस्तानी छोटे परदे की बड़ी उम्मीदों वाली नायिका प्रत्यूषा बनर्जी के अप्राकृतिक मृत्यु ने सिनेमा व् टी वी धारावाहिक प्रेमियों में दुःख , खलबली और भारी क्षोभ भर दिया है . ख़बरों के अनुसार इस घटना को प्रारंभिक तौर पर आत्महत्या कहा गया है . मगर तथ्यों व् परिस्थिति के मद्देनजर अन्य अंदेशा भी बताया जा रहा है . इन सबसे अलग यह काफी कड़वा तथा मर्मभेदक है की प्रत्यूषा अब इस जहाँ में नहीं है . सारे अंदेशों पर कार्यवाई के वावजूद भी प्रत्यूषा हेतु प्रत्याशा नहीं की जा सकेगी . वह सशरीर दुनिया को अलविदा कह जा चुकी है . उसके अनुपस्थिति को मानने एवं समझने के अलावा प्रत्युषा के शुभेक्षु अन्य दिलासा के उपाए शायद नहीं कर सकते . जहां अगर जरुरी है तो कानून अपना काम करेगी हीं . लेकिन प्रत्यूषा के परिणीति को सहज रूप में नही लिया जा सकता . इस घटना से देश के लाखों युवाओं के भविष्य का स्व्भविक सम्बन्ध भी अवश्य ठहरता हीं है . प्रत्यूषा का एकदम से जीवन वृत्त की प्रारंभिक अवस्था में हीं इतनी बड़ी और आखिरी असफलता के दमन में उलझ जाना कई प्रश्न खड़े कर देता है . क्या अपनी योगयता , क्षमता के दम से आगे आता युवा ऐसी गलती और नसम्झियुक्त हो सकता है ? , क्या कला , विज्ञानं और उच्च्तर यांत्रिकी व् वाणिज्यिक की ज्ञान के बाद भी मानव एवं जीवन – दर्शन मे इस कदर कमजोर हो सकता है ?,आधुनिक तकनिकी युग के ताकत के वावजूद ! , सम्पन्नता – सुविधा से युक्त हो के भी और अनेक तरह से विभिन्न स्वतंत्रता – सामर्थ्य में लबरेज गतिमान युवा न तो अन्य को समझ पा रहा और ना ही स्वयं को . सीधे रूप में आज दुर्भागयपूर्ण रूप से उसकी प्रतिबद्धिता दृष्यमान भौतिकता में समाहित होते जाने से भी जुड़ चुका है . लब्बोलुआब माना जाए तो युवाओं की दशा सामंजस्य व् समावेशी मानवीय अर्थों को कुपोषित होते जाने में प्रणीत है . युवाओं के आगे चुनौतिओं के सायास बोझ लगातार सम्मेलित हुए जा रहे हैं . ऐसे में युवशक्ति बहुरेगी ? समय इसे ज्यादा बेहतर जाहिर कर सकता है . हाँ , शोधपरक चिंतन – मनन के जीवन शैली समक्ष ऐसी बाधाएं पूरक पहलू ही साबित होतीं रहतीं हैं .

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