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फ़िल्मी भटकाव,उड़ते युवाओं में प्रभाव नतीजा आधार का अभाव

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हिंदुस्तान में महान साहित्यकारों , काव्यकारों और विभिन्न अन्य क्षेत्रों के कलाकारों की एक विशेष श्रृंखला रही है .संस्कृत के उपलब्द्ध साहित्य और फिर लोक साहित्य की गहरी पैठ से यह सरलता पूर्वक समझा जा सकता है .जब दादा साहिब फाल्के ने हिंदुस्तानी सिनेमा का विधिगत आगाज किया तो प्रारंभिक कृतियों से प्राचीन भारतीय संस्कृति के मूल्यों की पुनर्स्थापना ही लक्ष्य प्रतीत होता रहा है . क्योंकि देश की गुलामी और पिछड़ी मानसिकता से परहेज करते हिन्दुस्तानियत को मजबूत करने हेतु मान्य विधि के लिए फिल्म सशक्त जरूर थी . दादा साहब एवं अन्य शुरू के फिल्मकारों के समक्ष विचारों के गुलामी से निकालने की जद्दोजहद तार्किक ज्यादा लगती है , वनिस्पत की मनोरंजन की उद्देष्यपूर्ति . यह निर्विवाद और प्रभावपूर्ण उपलब्द्धि चरितार्थ रही की हिंदुस्तान ने असंख्य झंझावतों के बाबजूद अपनी आधारभूत चरित्र को हमेशा दिल में अवश्य रखा . भले अनेक परिश्थितियों में ऐसे विचारों व् अनुभवों को गले के निचे ही अर्थात अंतर्मुखी संचरण स्वरूप से सथापित क्यों न रखना पड़ा हो . प्रारंभिक सिनेमा के सांस्कृतिक अवधारणा के समानांतर बदलते मूल्यों ने इसे लगातार प्रभावित किया . जिसके प्रतिफल में फिल्मों ने अपनी रूप रेखा में परिवर्तन भी जारी रख्खा . धीरे – धीरे मनोरंजन मात्र हावी होता गया . साथ में अन्य कला क्षेत्र के लिए ग्लैमर की भूमिका बनाने में हिंदुस्तानी सिनेमा अग्रणी भी बना . जिसका परिणाम कला और फ़िल्में बाजारवाद की वेदी पर समर्पित हो पड़ीं . फाइलों में हिंदुस्तानी नियामक मार्गदर्शन से तमाम फिल्म निर्माण – प्रदर्शन के प्रावधान भी आगाह करते चलते रहे . लेकिन फिल्मों ने मूलतः माना व् अपनाया वाही जो उपभोक्ता तथा बाजार को भाया. हिंदुस्तानी सिनेमा के प्रारम्भ १९१३ से विभिन्न कालखण्डों में अनेक परिवर्तन अवश्यम्भावी थे तो जिनके दरम्यान कई प्रकार के फ़िल्मी रूपांतरण होते गए . विवादों की की उपेक्षा करते हुए इतनी बात जरूर मानता हूँ की फ़िल्मी ग्लैमर का नीवं ग्रेट शो मैन राजकपूर की देन रही . कलांतर में प्रतिस्पर्धा ने इस प्रयोग से अपने अहमं तुष्टि करके बड़ी लकीर के लिए फिल्मों को चकाचौंध मात्र से लोकप्रियता की भूमिका दे डाली और साथ फिल्म व्यवसाय के एक ौधोगिक रूप की परम्परा निर्मित हो गई . जिसके परिणाम स्वरूप फ़िल्मी कला ने प्रकृति , गावं , जन – जीवन , प्रेम , देश जैसे व्यवहारिक व् समाजिक विषय के केंद्रबिंदु से कट के अपने आधुनिक व्यवसायिक सफलता के तमाम हथकंडे अपना लिए .फिर तो हिंदुस्तानी सिनेमा ने देश निर्माण के चेतनात्मक भूमिका के बजाय अंग – प्रदर्शन ,बलात्कार , आपराधिक अलंकार भाव , हेरा फेरी , यौन अपराध , किशोर प्रेम का अधकचरा स्वरूप , झूठ को प्रभावशाली सफलता परिणाम , नशा का रोमांचक – आनंददायक प्रसरण जैसे मनोगत विकृति उत्पन्न करने व् बढाने का मनोरंजक कार्य भारी लाभ के साथ किया . यहां तक की गरीब का आभाव , एक -आध अपराध का चरित्र और कथा , दर्शक के दिल की सुप्त वासना , किशोरों के अश्लील जिज्ञासा – अज्ञान जैसे मात्र समझने व् प्रदर्शन से परहेज करने वाले विषय को प्रसारित करके भी उगाही का तथाकथित कला व्यवसाय अथवा उद्धोग भी बना लिया है .हाल की विवादों से घिरी फिल्म “उड़ता पंजाब ” को इसी अंदाज में माना जा सकता है . ———— अमित शाश्वत

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